एकांत में बैठी कभी यही सोचती हूँ

मेरी बनायी एक छोटी से रचना पेश है ::

सूरज की गर्माहट देने वाली किरणें कभी कभी
आँखों में चुभती क्यों हैं?
चिड़ियों की चेह्चाहाने की मीठी मधुर आवाज़,
कानों में पिघले शीशे की तरह गलती क्यों हैं?
जो ज़िन्दगी कभी हसीं खूबसूरत सफ़र सी चलती है,
वही ज़िन्दगी काँटों भरी राह सी लगती क्यूँ है?

आंसुओं में छुपे ग़म के परदे,
झिलमिल से करते हैं,
हाथो में पड़ी कोमल सिलवटें,
शिथिल से सरकते हैं,
कौन जाने ये वक़्त है या हम?
जिसके मौसम आज यूँ बदल गए से लगते हैं।

एकांत में बैठी कभी यही सोचती हूँ,
वक़्त ने जो दिखाया क्या वही मंज़र,
स्वयं ही घूम मेरे नज़दीक आ बैठा है,
या मैं ही स्वतः चलते चलते,
ज़िन्दगी की पुरानी गलियों में निष्प्राण पडी हूँ।


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