ज़िन्दगी के आखरी 60 मिनट में आप क्या करेंगे?

क्या आप ऐसे में जी सकते हैं?
एक बार मुझे एक बढ़िया सेमिनार attend करने का सुनेहरा मौका मिला। ये सेमिनार एक दिन का था और ये Personal Glorification and Communication Development पर आधारित था। इस सेमिनार में हमें इंसानों की अलग अलग चीज़ों के बारे में, हम कैसे और किस हद तक बिना शब्दों के एक दुसरे से बातें करते हैं और कुछ दिमाग को आराम देने की activities के बारे में बताया गया। आमतौर पर ये सब बातें साधारण सी लगती हैं मगर इस सेमिनार की खास बात ये थी कि यह एक विद्वान् कॉर्पोरेट ट्रेनर Mr. Naresh Chhitija का ट्रेनिंग सेशन था। उन्होंने सेशन की शुरुआत बहुत ही अच्छे से की और जैसे जैसे ट्रेनिंग आगे बढती गयी, हम सभी उनकी बातों से प्रभावित होते गए। कम से कम मैं तो प्रभावित थी। मैं उनकी बातों को बहुत ध्यान से सुन रही थी और उनके हर एक शब्द को अपने दिमाग में बैठाने की कोशिश कर रही थी। उनकी बातें बहुत ही प्रेरणादायी थी और हमें ज़िन्दगी और व्यवहार के कई मुद्दों पर सोचने को मजबूर कर रही थी। मैंने कुछ चीज़ें नोट भी की जो मुझे आगे काम दे सकती थी।


बातें करते समय, वो ट्रेनर कुछ सवाल हम सभी से पूछ रहे थे जो बहुत ही रोचक थे। उनमे से एक को मैं यहाँ बताना चाहूंगी। मुझे उनके तथाकथित शब्द तो याद नहीं मगर इतना ज़रूर याद है की उस सवाल में उन्होंने ऐसी मुश्किल परीस्थितियां पैदा की थीं कि किसी की जान पे बन आये। तब उन्होंने हम सबसे पूछा कि हम ऐसे में क्या करेंगे।

"मान लीजिये आपके पास सिर्फ 60 minutes हैं आपकी ज़िन्दगी के और आप एक बर्फीले पहाड़ पर  हैं। आपके पास न तो खाने को कुछ है और न ही कुछ पीने को। आपके पास संचार (communication) की भी कोई सुविधा नहीं है। सिर्फ आप हैं और आपके पास दूर दूर तक कोई नहीं है। आप मरने की स्थिति में हैं। तब आप ज़िन्दगी के आखरी 60 मिनट मे क्या करेंगे?"

हम सभी सोचने लगे मगर मुझे एक उपयुक्त जवाब सूझा जिनकी उन ट्रेनर को उम्मीद थी। मगर मैं स्टेज पर जवाब देने नहीं गयी। मैं कुछ मिनट पहले ही स्टेज पर कुछ बोलने गयी थी और अब दुबारा जाने में मुझे थोड़ी हिचकिचाहट हुई। मुझे लगा लोग क्या सोचेंगे? कि मैं कितना बोलती हूँ या ऐसे ही कुछ मैंने सोचा। बाद में मुझे समझ आया की मुझे जाना चाहिए था स्टेज पर। मुझे उस तरह की बातें नहीं सोचनी चाहिए थी। खैर, कुछ लोग आये अपने जवाबों के साथ मगर किसी का भी जवाब ट्रेनर को उपयुक्त नहीं लगा। लोगों ने कहा कि वो कुछ नहीं करेंगे और अपने मरने का इंतज़ार करेंगे; कुछ ने कहा की ऐसा हो ही नहीं सकता। ट्रेनर ने ऐसे किसी भी जवाब को तवज्जो नहीं दिया । उसके बाद उन्होंने इस सवाल के सही उत्तर को ढूँढने का जिम्मा हमें सौंप कर अपना ट्रेनिंग देने में व्यस्त हो गए।

मेरा जवाब आज भी यही है: " अगर ऐसे कठिनतम क्षणों में मेरी ज़िन्दगी के आखरी 60 मिनट बचे हैं तो मैं आखरी 59th मिनट तक लडूंगी बच निकलने का रास्ता तलाशने के लिए और तब आखरी मिनट में मरना पसंद करूंगी। मैं लडूंगी क्योंकि जीने के लिए संघर्ष हम मनुष्यों का स्वभाव है और एक मनुष्य होने के नाते मुझे ऐसे ही करना चाहिए। और किसे पता कि आपको संघर्ष करते करते क्या मिल जाए? शायद एक बचाव का रास्ता जिसका मिलना ऐसी मुश्किल स्थिति में होने जैसा ही असंभव हो।"

सेशन ख़त्म हो चुका था और मैं उस ट्रेनर से बहुत प्रभावित थी। ऐसा नहीं था कि जो बातें उन्होंने बतायीं वो बहुत नयी थी। उनमे से कई सारी बातें मुझे पता थीं और मैंने कई नयी बातें भी सीखी। मगर आपके कहने का तरीका, आपका व्यवहार और आपके चयनित शब्द एक साधारण सी बात को भी बहुत उम्दा और अनोखा बना सकती हैं। और ऐसी ही कला Mr. Naresh Chhitija के पास थी। 

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