तुम्हारी याद में...

रात काफी हो चुकी है पर मेरे पति अभी आये नहीं हैं। उन्हें ऑफिस के ही कुछ ज़रूरी काम से रुकना पड़ा। घर का सारा काम ख़तम करने के बाद भी काफी समय बच गया। कुछ इधर उधर की चीज़ें पढ़ीं और थोडा टीवी भी देखा। मगर कुछ खाली खाली सा लग रहा था। मन भी नहीं लग रहा था तो बेमन से ही टीवी देखती रही थोड़ी देर मगर कितनी देर? मन धीरे धीरे सच बता ही देता है। खैर! कुछ ख़ास समझ नहीं आया तो सोचा एक कविता ही बनाने की कोशिश करती हूँ। अच्छा समय व्यतीत होगा और जो अगर अच्छी पंक्तियाँ बन गयीं तो क्या कहने। सुमित तो सुनके बेहद खुश होंगे। तो ताबड़ तोड़ जोर देने के बाद कुछ चंद लाईने दिमाग की नसों को निचोड़ कर बाहर आई जो कुछ इस तरह से हैं:



जो तुम साथ नहीं तो कहीं कुछ भी नहीं,
ना ये ज़मीं का सहारा और ना आसमाँ का किनारा।
वक़्त का दरिया तो बहता रहा,
पर हम उस पल में रुके ठहरे सहमे से बैठे रहे।
ना दिल है यहीं ना हम हैं यहीं,
जो तुम साथ नहीं तो कहीं कुछ भी नहीं।

क्यों वक़्त पंख लगाकर उड़ चला,
जब तुम यूँ पास आकर बैठ गए?
क्यों दिल उन नज़रों की गहराईयों में डूब चला?
जब तुम नज़र में नज़र मिलाकर कुछ यूँ हंस दिए?
क्यों जीवन की हलचल इक पल में थम गयी?
जब तुमने कहा, "मैं हूँ ना" और बस!
ज़िन्दगी जैसे इन शब्दों में सिमट गयी।

यही प्यार है शायद या ज़िन्दगी का हसीं यथार्थ,
आँखों में खेलता मधुर स्वप्न है या वक़्त की दवात से गिरा रेशमी शबाब,
मगर सच तो यही है मेरे हमदम-
जो तुम साथ नहीं तो कहीं कुछ भी नहीं।

और क्या अच्छी बात हुई की कविता पूरा करते न करते सुमित आ भी गए। जल्दी से उन्हें सुनाया और उन्हें बेहद पसंद भी आया। आये भी क्यों ना? आखिर उनके लिए जो बनायी थी :) 









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