द ब्रेन स्टॉर्म थ्योरी

एक अखबार मैं  मैंने एक बहुत ही रोचक आर्टिकल को पढ़ा जिसका शीर्षक था "द ब्रेन स्टॉर्म थ्योरी". इसे मौलाना वाहिदुद्दीन खान ने लिखा था। जो मैंने पढ़ा वो जानकारी रखने योग्य है और इसको यहाँ मैं इसलिए शेयर करना चाहती हूँ ताकि हम अपने दिमाग की एक और जटिल प्रक्रिया को समझ पाएं जो हमारे पूरे अस्तित्व पे बहुत ही गहरा असर डालती है।

ये आर्टिकल मौलाना के Kigali जगह पे घुमते हुए एक किस्से को बताता है। Kigali, Rwanda शहर की राजधानी है और ये सेंट्रल अफ्रीका में स्थित है। मौलाना वहां एक गुजरती भारतीय से मिले। वो एक कपडे की दूकान चलाता था और अपने ग्राहकों से अंग्रेजी भाषा में बहुत ही सरलता से बात करता था। मौलाना को ये देख कर काफी आश्चर्य हुआ। उसके धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने की क्षमता ने मौलाना को चकित कर दिया।वो अपनी जिज्ञासा को शांत नहीं कर पाए तब उस दुकानदार की कहानी को उसके एक दोस्त ने सुनाया।

"कुछ साल पहले जब वो (गुजराती भारतीय) यहाँ आया था तो उसे अंग्रेजी ज़रा भी नहीं आती थी जबकि उसके ग्राहक बहुत अच्छे से अंग्रेजी में बातें करते थे। Kigali में बोलचाल की मुख्या भाषा अंग्रेजी है और अपने कपड़ों के व्यवसाय को चलाने के लिए उसे अंग्रेजी सीखनी पड़ी। शुरूआती नासमझी से भरी गलतियों की वजह से उसे कभी कभी हंसी का पात्र भी बनना पड़ता था। जैसे की एक दिन उसके एक ग्राहक ने उसके अंग्रेजी न बोल पाने की काबिलियत पे ताना कसते हुए कहा की जो भाषा बोलनी नहीं आती उसे बोलने का क्या तुक है जिसका उत्तर उसने बेहद ही नम्रता के साथ दिया, "मैं गलत अंग्रेजी इसलिए बोलता हूँ ताकि मैं एक दिन इसे सही तरीके से बोल सकू". दो साल के निरंतर प्रयास ने उसे अंग्रेजी बोलने में माहिर कर दिया और वो अपने ग्राहकों से बढ़िया तरीके से अंग्रेजी में बात करने लगा।

"जहाँ चाह  वहां राह" की बेहद अच्छी मिसाल है ये। उस दुकानदार को अंग्रेजी का कोई शब्द नहीं आता था मगर अपने दृढ निश्चय से उसने इसमें महारत हासिल की और वो भाषा सीख ली जो कभी उसके लिए बेहद अनजान थी।

ये बात यहाँ एक और थ्योरी को साबित करता है कि जब हमारा दिमाग किसी ऐसे काम को करने के लिए बाध्य होता है जो हमने पहले कभी नहीं किया तो इस वजह से हमारे दिमाग की कुछ नयी खिड़कियाँ खुलती हैं। ऐसे काम को ,जिसे हमारे दिमाग में बड़ी हलचल हो, को Psychology की भाषा में "द ब्रैन स्टॉर्म थ्योरी" कहा जाता है। ऐसे ब्रेन स्टॉर्म या दिमागी झंझावात सकारात्मक या नकारात्मक result दोनों ही ला सकते हैं। जब कोई इंसान किसी shocking या दिमाग को हिला देने वाली परिस्थिति से गुज़रता है जो उसे पूरी तरह से प्रभावित करती है तो उस इंसान के दिमाग में ब्रेन स्टॉर्म आता है। इससे दिमाग की निष्क्रीय कोशिकाएं यानी brain  cells सक्रीय हो जाती हैं और इसकी वजह से उसके दिमाग के कुछ सोये हुए तार/तंतु सक्रीय होकर उसे ऐसे इंसान में बदल देने की काबिलियत रखती हैं जिसके अंदर होने का एहसास उस इंसान को झंझावात आने के पहले कभी न था। 

उस आर्टिकल में भीम रामजी अम्बेडकर का उदाहरण दिया गया था। वो एक छुआ छुत (untouchable ) परिवार में जन्म लिए थे और उन्हें अपनी ही सोसाइटी से बचपन से ही हीन भावना का शिकार होना पड़ा था। इस भेद भाव ने उन्हें बुरी तरह से प्रभावित किया और उन्होंने निश्चय किया कि वो जितना ज्ञान अर्जित कर सकेंगे करेंगे ताकि वो इस समाज से ऐसे कुप्रथाओं को मिटा सकें। बहुत परिश्रम और कठिनाइयों को झेलने के बाद उन्होने अपार मात्र में ज्ञान अर्जित किया और एक ऐसे महान इंसान बन गए जिसका मुकाबला करना मुश्किल था। अपनि दृढ़ता और प्रयास के बल पर बाद में वो भारतीय संविधान (Indian Constitution) के सदस्य बने। स्वतंत्रता के बाद उन्हें Chairman of the Drafting committee of the Indian Constitution के र्रूप में भी सम्मान मिला।

यहाँ मैं कुछ और examples  देना उचित समझती हूँ। बॉलीवुड के महानतम कलालार अमिताभ बच्चन अपने करियर के शुरूआती दिनों में Air India Radio (AIR) में अपनी आवाज़ आजमाने गए थे मगर उन्हें ये कहकर नकार दिया गया की उनकी आवाज़ भारी और वजनदार है। मगर यह घटना उनके भाग्य को नहीं बदल सकी। वरन, उन्होंने इसमें एक चुनौती देखी और अपनी लगातार कोशिशों और दृढ इच्छाशक्ति से आज उनकी आवाज़ को भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बहुत जाना जाता है।

शाहरुख़ खान जिन्हें रोमांस का बेताज बादशाह कहा जाता है और जिनकी तुलना किसी और से करना मुश्किल है, ने अपनी माँ से बचपन में कहा था की वो बड़े होकर बॉलीवुड में एक्टर बनेंगे। उनकी माँ ने उनके बचपन में कहे शब्दों पर पूरी तरह से विश्वास किया क्योंकि वो जानती थी की शाहरुख़ जो एक बार कह देता है वो करके ही छोड़ता है। शाहरुख़ ने अपनी माँ को सही साबित किया। 

ब्रूस ली, जो की Martial arts के सबसे महान कलाकार हैं, को किसी पहचान की ज़रुरत नहीं। आपको ये जानकार आश्चर्य होगा की जब ब्रूस ली हॉलीवुड में अपना करियर शुरू करने आये थे तो उन्होंने अपने आप को एक पत्र लिखा था जिसे आप नीचे देख सकते हैं: 



इस पत्र को उन्होंने "My Definite Chief Aim" के नाम से लिखा था और इसमें ये लिखा है कि वो अगले दस सालों में अमेरिका के सबसे बड़े स्टार होंगे और उनका मेहनताना सबसे ज्यादा होगा। बदले में वो अपना श्रेष्ठतम performance देंगे जो एक एक्टर की काबिलियत के तहत आता है। 1970 से शुरू होकर वो 1980 तक करीब $10, 000, 000 के मालिक होंगे और अपनी ज़िन्दगी अपने तरीके से जियेंगे जिससे उन्हें आतंरिक शान्ति मिले। पत्र के अंत में उनका हस्ताक्षर और लिखी गयी तारीख भी दी है।

वो इतना सब कुछ हासिल कर पाने में सफल ही नहीं रहे बल्कि वो इससे भी कहीं ज्यादा पैसा और शोहरत कमाने में कामयाब रहे। जो उन्होंने दस साल पहले अपने लिए तय किया था उन्होंने उससे भी कहीं ज्यादा कमाया।  हम में से कितनों के पास ऐसी हिमात है जो कि ऐसा letter खुद को लिख सकें? ऐसे विरलों में विरले ही होंगे।

ये सारे उदाहरण ज़मीन से आसमान तक के सफ़र को बताते हैं। सफलता दृढ इच्छाशक्ति, ललक, हिम्मत, तप और जोश का ऐसा मिलन है जिसे अलग नहीं किया जा सकता। बाकी सारी ज़रूरी बातें साथ साथ ही अपने आप आ जाती हैं। ज़रुरत है तो बस-- अपने दिमाग में एक स्टॉर्म लाने की और आप अपने ही तरह के एक सेलेब्रिटी या सितारा बन सकते हैं।

इसी पोस्ट को English में यहाँ पढ़ें।
























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