18 January 2013

"क्या आप मेरी नज़र से देखोगी?" पार्ट 1 :: तुम एक शर्मिंदगी हो

मेरे पाठकों का बढ़िया सा स्वागत है। आज मैं एक कहानी शेयर करने जा रही हूँ। ये काल्पनिक है और पूरी तरह से मेरी ही रचना है। इसके किसी भी हिस्से को या पूरी कहानी को किसी भी तरीके से नक़ल ना किया जाए। ये एक कॉपीराइट कहानी है।

कहानी का सारांश :: ये कहानी एक माँ और उसके सात साल के बेटे की है। माता-पिता अक्सर ऐसी बातें करते हैं जिन्हें उन्हें नहीं करना चाहिए। उनके कठोर शब्द, बच्चे के प्रति निष्ठां का अभाव, बच्चे को नज़रंदाज़ करने की प्रवृत्ति और बच्चा किस बारे में क्या सोचता है इसके प्रति उदासीनता अक्सर अनचाहे परिणाम लेके आता है। ये कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

ये कहानी दो हिस्सों में बंटी होगी, हर एक का अपना शीर्षक होगा। पार्ट 1 जहाँ माता-पिता के मौखिक व्यवहार की वजह से बच्चे के आतंरिक पीड़ा पर प्रकाश डालेगा वहीँ पार्ट 2 इस बात पर जोर देगा कि माँ-बाप को भी बच्चों के नज़रिए से बातों को देखना चाहिए। दोनों ही पार्ट्स माँ और बेटे अतुल्य के मानसिक स्थिति और साथ में दुसरे चरित्रों पर भी व्यक्तिगत तरीके से प्रकाश डालेंगे।

पार्ट 1 :: "तुम एक शर्मिंदगी हो"

                               


"माँ! क्या मैं निमित के घर खेलने जा सकता हूँ? मैंने अपना छुट्टीयों में दिया हुआ स्कूल का होम वर्क कर लिया है" सात साल के अतुल्य ने अपनी माँ से उम्मीद भरी आवाज़ में पूछा जबकि ये साफ़ था कि वो थोडा परेशां और चिंतित था। वो आज सुबह ही निमित के घर गया था और अब फिर से उसी के लिए आज्ञा मांग रहा था। निमित उनका पडोसी था और अतुल्य के ही क्लास में पढता था।

माँ एक नोवेल पढ़ रही थी जब अतुल्य ने अपना होमवर्क फिनिश किया। वो अपनी नोवेल में इतनी डूबी हुई थी कि पहले पहल अतुल्य ने क्या कहा उसका ध्यान ही नहीं गया।

"क्या? क्या कहा अतुल?" उसने उपर देखा। वो प्यार से अपने बेटे को अतुल बुलाती थी।

"मम्मा! क्या मैं निमित के घर खेलने जा सकता हूँ? प्लीज प्लीज प्लीज" अतुल्य ने अपने दोनों हाथ पूजा करने के तरह से निवेदन भरे स्वर में कहा। माँ थोड़ी देर चुप हो गयी।

"मगर तुम तो उसके घर जा चुके हो न? फिर से जाना ठीक नहीं" उसने जवाब दिया।

"क्यों ठीक नहीं है? आप भी तो अपने पड़ोसियों से दिन में एक से ज्यादा बार बातें करती हो ना। तब ये कैसे सही हुआ?" उसने अपने दोनों हाथ स्पष्टीकरण के लिए सीने पर बांध लिये।

माँ ने हथियार डाल दिए। "अच्छा अच्छा ठीक है। जाओ अतुल मगर मुझे परेशान मत करो। मैं एक बहुत ही उम्दा नोवेल पढ़ रही हूँ। तुम यहाँ पर रहोगे तो मेरी सोच से भी ज्यादा उत्पात मचाओगे। जाओ लेकिन एक घंटे में आ जाना" उसने बेटे को निर्देश दिया और वापस नोवेल पढने में मशगूल हो गयी।

अतुल्य को ये सब सुनके थोड़ी सी नाराज़गी हुई मगर वो निमित के घर चला गया।

अतुल्य के जाते ही माँ ने फिर से पढना शुरू कर दिया। पूरे घर को शांत पाकर उसे काफी सुकून मिला।

तकरीबन एक घंटे के बाद अतुल्य रोते हुए घर आया और साथ में निमित की माँ भी पीछे पीछे आयीं। माँ जो कि नोवेल पढने में इतनी व्यस्त हो गयी थी कि उसे पता ही नहीं चला कि कितना समय बीत चूका है।

किसी बुरी बात के ख्याल से वो दरवाज़े की तरह दौड़ी। जैसे ही दरवाज़ा खुला, अतुल्य अपनी माँ से लिपट गया। माँ उलझन में पड़ गयी कि क्या हुआ।
निमित की माँ, सुरैया, ने चिल्ला कर कहा, "तुम्हारा बेटा कितना शैतान है! तुमने उसे कोई मैनर्स नहीं सिखाये हैं क्या?" वो तेज़ आवाज़ में बात कर रही थी।

माँ को एक झटका सा लगा। "ये मुझसे इस तरह से बातें क्यों कर रही है?" उसे आश्चर्य हुआ मगर फिर भी उसने शांति से काम लिया।

"क्या हुआ सुरैया? सब ठीक है ना?" ऐसा कहते हुए उसने अतुल्य को अपने से चिपका लिया। माँ का स्पर्श पाकर उसका रोना ज़ोरों से बढ़ गया।

"सब ठीक है? हुह! अतुल्य कितना असंवेदनशील है। इसे कभी भी मेरे घर मत भेजना" सुरैया ने 'कभी नहीं' को इतनी नफरत से कहा कि माँ का मन किया उसे एक ज़ोरदार तमाचा दूं। अड़ोसी पडोसी भी अपनी खिडकियों और दरवाज़े से झांकना शुरू कर कर दिया था। वैसे भी, दो लोगों का झगडा लोगों के लिए मनोरंजन का एक बहुत अच्छा साधन होता है। 

माँ को पता था कि सुरैया एक बददिमाग और थोड़ी कम अच्छी इंसान है मगर भी उसने किसी तरह उसके साथ अपना रिश्ता बना के रखा था। पड़ोसियों को दोस्त की तरह रहना चाहिए, ना कि अजनबी या दुश्मन की तरह। अपने गुस्से को पीते हुए उसने सुरैया को अंदर आने का ईशारा किया मगर उसने ठुकरा दिया।

माँ अपने बेटे की तरह मुड़ी। उसे सुरैया से एक और बार पूछना बेकार लगा। 

"अतुल! मेरी तरफ देखो बेटा। मुझे बताओ क्या हुआ है" माँ ने नरमी से पूछा।

"वो क्या बताएगा। उसके अंदर इतनी हिम्मत नहीं कि वो अपनी गलती खुद बता सके मानना तो दूर की बात है। मैं बताती हूँ"

"नहीं आंटी! प्लीज। मम्मा को अच्छा नहीं लगेगा सुनके और सच तो यह है कि मैंने कुछ किया ही नहीं। मैंने बताने की कोशिश की मगर आप सुन ही नहीं रही हैं" अतुल्य ने सहमते हुए कहा। डर की वजह से वो ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था।

माँ ने अपने आप को इन दोनों के बीच फंसा हुआ सा महसूस किया।

"ये तुम्हे मेरे बेटे के साथ अपने बर्ताव को करने से पहले सोचना चाहिए था बेशरम इंसान" सुरैया ने नफरत भरी निगाहों से कहा। अब माँ अपने आप को और संयमित नहीं रख पायी।

उसने कठोर चेहरे के साथ कहा, "तुम मुझे बता रही हो सुरैया या मैं दरवाज़ा तुम्हारे मुंह पर ही बंद कर दूं?"

"मैं बताती हूँ" और तभी माँ के कानों में अतुल्य के जोर से रोने की आवाज़ पड़ी। उसने निश्चय रूप से ही कुछ ऐसा किया था जो उसे नहीं करना चाहिए था।

"जब अतुल्य एक घंटा पहले मेरे घर खेलने आया तो वो निमित के साथ टॉयज खेलने लगा। बाद में निमित ने उसे पढ़ाई में हेल्प करने को कहा और दोनॊ निमित के रूम में चले गए मगर थोड़ी ही देर बाद मुझे निमित के जोर से रोने की आवाज़ सुनाई दी। जब मैं दौड़ी दौड़ी वहां गयी तो देखा कि पूरे फर्श पर पेपर्स बिखरे पड़े हैं। पूछने पर निमित ने बताया कि अतुल्य ने उसकी मैथ्स की नोटबुक फाड़ दी है। वो दोनों पढ़ाई कर रहे थे लेकिन अतुल्य को पढने का मन नहीं था। वो थोडा और टॉयज के साथ खेलना चाहता था। जब निमित ने अतुल्य की बात नहीं सुनी तो उसने गुस्से में आकर निमित की मैथ्स की नोटबुक फाड़ दी। अब निमित कैसे अपने एग्जाम की तैयारी करेगा?"

माँ को ये सब सुनके झटका सा लगा। अतुल्य ने सचमच ही निमित के साथ बहुत ही गलत काम किया था। उनके एग्जाम एक ही हफ्ते बाद हैं और अब जबकि निमित की मैथ्स नोटबुक फट चुकी है, वो कैसे तैयारी करेगा? और उससे भी ज्यादा उसकी पूरी पढ़ाई का नुक्सान होगा। वो गुस्से में अतुल्य की तरफ मुड़ी।

"नहीं मम्मा! ये सब कुछ गलत कह रही हैं। बस आप एक बार मेरी बात सुन लीजिये। प्लीज" अतुल्य ने अपनी माँ का हाथ पकड़ते हुए कहा।

"हे भगवान् अतुल! ये तुमने क्या किया और क्यों किया?" माँ ने उसे बुरी तरह डांटा और अपना हाथ पीछे खींच लिया। अतुल्य का रोने का सिलसिला चालू रहा और वो अपना सिर बार बार नहीं की दिशा में हिलाता रहा। जब उसने देखा कि उसकी अपनी माँ उसे नहीं समझ पा रही है तो उसे अपनी बात कहने की रही सही आशा भी जाती दिखाई दी। उसने एक बार फिर कोशिश की मगर माँ ने सुनने से मना कर दिया।

"मैं बहुत शर्मिंदा हूँ अतुल ने जो किया। उसे प्लीज माफ़ कर दो। निमित उसकी मैथ्स नोटबुक इस्तेमाल कर सकता है और अपनी पढ़ाई पूरी कर सकता है। मुझे उसके नुक्सान का खेद है" माँ ने अतुल्य की मैथ्स नोटबुक सुरैया को पकडाते हुए कहा। सुरैया ने कुछ और बुरा भला कहा और चली गयी।

अब अतुल्य को पता था कि अब उसकी अपनी माँ की तरफ से भयंकर डांट और गुस्से की बौछार होगी। वो जल्दी से घर के अंदर गया और अपने आप को अपने रूम में बंद करने की कोशिश करने लगा। माँ ने ताड़ लिया। उसने उसकी बांह जोर से पकड़ी और एक थप्पड़ चेहरे पर लगा दिया। अतुल्य के शरीर में असहनीय दर्द दौड़ गया। उसने अपना हाथ अपने गाल पे रखा और जहाँ था उसके पैर वहीँ जम गए।

"मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम ऐसा घटिया काम करोगे। ऐसा क्यों किया तुमने? मुझे कितना दुःख हुआ ये सब जानकर। तुम मेरे लिए एक शर्मिंदगी हो। अब मैं कैसे सुरैया से नज़र मिला पाऊँगी? अब ये खबर जल्द ही जंगले में आग की तरह फ़ैल जाएगी। ओह! मैं बहुत शर्मिंदा हूँ" और माँ ने अपने कठोर शब्द रुपी कंकडों से अतुल्य के नन्हे से दिल पे बहुत बड़ा सा दुःख का पत्थर सा रख दिया। उसने एक बार फिर से कोशिश की अपनी बात समझाने की।

"लेकिन मम्मा! मैंने कुछ नहीं किया। मैं तो बस...."लेकिन वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाया। माँ ने उसकी बात बीच में ही काट दी।

"हाँ हाँ। तुमने कुछ नहीं किया। नोटबुक तो अपने आप ही जादू से फट गयी। है न?" उसने ज्वलंत  निगाहों से अतुल्य की तरफ देखा। उसने उसे एक छोटा सा भी मौका नहीं दिया अपनी बात कहने का।

दर्द और आंसू में डूबा अतुल्य अनजाने में सोचने लगा।

कैसे कोई कहता है कि माँ अपने बच्चे की सबसे अच्छी दोस्त होती है? उसकी माँ तो कभी ऐसी नहीं रही।

कैसे कोई कहता है कि माँ अपने बच्चे की हर बात सुनती है? मेरी माँ के कान तो हमेशा से ही मेरी बातों के लिए बंद रहे।

कैसे कोई कहता है कि चाहे कुछ भी हो जाए, एक माँ अपने बच्चे का साथ कभी नहीं छोडती? मेरी माँ तो हमेशा दूसरों की ही सुनती आई है।

ऐसे ना जाने कितने ही सवाल थे जो अतुल्य के दिमाग को झकझोर रहे थे। वो थप्पड़ से बहुत डरा हुआ था। इसने उसकी अपनी माँ के उपर के विश्वास को हिला दिया था। वो अपनी बात समझाना चाहता था; वो बताना चाहता था कि असल में बात क्या हुई मगर वो एक बड़े से दानव की तरह खाड़ी थी जिसके पास कान और दिमाग थे ही नहीं। हाँ! वो एक माँ के रूप में दानव है। उसने मेरी बात कभी नहीं सुनी। उसे अपनी माँ से नफरत हो गयी। उसकी माँ की ओर से आने वाले निरंतर कटु शब्द उसके दिल को छलनी कर रहे थे। जब उसे लगा कि अब वो और ज्यादा नहीं सुन सकता तब वो अपनी माँ पर जोर से चिल्लाया। ऐसा उसने पहले कभी नहीं किया था।

"क्या आप मेरी बात कभी सुनोगी मम्मा? क्या कभी आप मेरे नज़रिए से भी चीज़ों को असल रूप में देखोगी? क्या तुम मुझे कभी सुनोगी? मैं नफरत करता हूँ तुमसे कि तुम मेरे बारे में कुछ नहीं जानती".

माँ स्तब्ध थी। उसने ऐसा अपमानजनक व्यवहार अपने बेटे से उम्मीद नहीं की थी। उसके शब्दों ने उसके विवेक को कुछ मिनटों के लिए फ्यूज कर दिया। उसे समझ नहीं आ रहा था। अतुल्य पहले ऐसे कभी नहीं चिल्लाया था। अगले क्षण जब बुद्धि ने काम करना शुरू किया तब उसने अपने बेटे से पूछने का निश्चय किया; ऐसा कुछ जो उसने भी पहले कभी नहीं किया था। उसने निश्चय किया कि निमित के साथ हुई घटना पर वो अतुल्य की बात सुनेगी।

To be continued.........
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और यहाँ ये कहानी विराम लेती है।

किसी भी माँ-बाप के लिए सबसे ज़रूरी बात होती है अपने बच्चे की बातों को सुनना। वो क्या कहना चाहते हैं, क्या करना चाहते है और उससे भी ज्यादा, वो अपने माँ-बाप से क्या चाहते हैं ये सब किसी भी खुशहाल परिवार के आईने के महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं। हर एक लापरवाही से एक दरार पैदा होती है और इससे एक सुंदर परिवार का नक्शा बदसूरत हो जाता है।

पढ़ते रहिये ये जानने के लिए कि क्या हुआ जब अतुल्य ने अपनी बात कही? क्या वो सही कह रहा था या अपनी माँ से झूठ बोल रहा था? सुरैया किस हद तक सही थी? क्या अतुल्य अपनी माँ को अपने नज़रिए से समझा पायेगा? क्या माँ घटना को अपने बेटे की नज़र से देख और समझ पायेगी?

ये सारे और कई दुसरे मासूम सवाल कहानी के अगले हिस्से में संजीदगी से सुलझाए जायेंगे।

इसी पोस्ट को ENGLISH में यहाँ पढ़िए :: "Can you please borrow my eyes?" Part 1 :: You are an embarrassment
























































































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