22 January 2013

"क्या आप मेरी नज़र से देखोगी?" पार्ट 2 :: " मातृत्व का थोड़ा सा अंश"

कुछ दिनों पहले मैंने एक स्टोरी लिखनी शुरू की थी अपने ब्लॉग पर। ये स्टोरी एक माँ और उसके सात साल के बेटे अतुल्य की है। ये कहानी उनके रिश्ते की है जो माँ-बाप के बच्चों के पालन पोषण और एक बच्चे के मानसिक स्थिति पर प्रकाश डालता है। माँ-बाप कभी कभार बच्चे की असल ज़रुरत पर ध्यान नहीं दे पाते और इसकी वजह से बच्चे के अंदर भावनाओं का एक भंवर सा उठता है। इससे वो एक दुविधा की स्थिति में आ जाता है जो उसके  समझने को शून्य कर देता है कि वो किस पर विश्वास करे और किस पर नहीं जबकि उसके अपने माता-पिता उसपर भरोसा नहीं करते।

इस कहानी के बारे में और ज्यादा जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :: "क्या आप मेरी नज़र से देखोगी?" पार्ट 1 :: "तुम एक शर्मिंदगी हो". इस पर क्लिक करने से आपके लिए एक नया विंडो खुलेगा।

ये पार्ट पढ़ने से पहले पार्ट 1 ज़रूर से पढ़ लें ताकि आपको कहानी में हुई हर बात की जानकारी हो।

Disclaimer :: ये कहानी काल्पनिक है और पूरी तरह से मेरी ही रचना है। इसके किसी भी हिस्से को या पूरी कहानी को किसी भी तरीके से नक़ल ना किया जाए। ये एक कॉपीराइट कहानी है।

पार्ट 1 का सारांश :: अपनी छुट्टियों में मिला हुआ गृहकार्य ख़तम करने के बाद अतुल्य अपने पडोसी निमित के घर अपनी माँ से आगया लेने के बाद खेलने गया। एक घंटे बाद निमित की माँ सुरैया और अतुल्य दोनों ही वापस आते हैं। अतुल्य बहुत ज़ोरों से रो रहा था। सुरैया अतुल्य के बारे में बुरा-भला कहने लगती है और बताती है कि उसने निमित की मैथ्स की नोटबुक फाड़ दी थी।

ऐसा सुनकर माँ को धक्का लगता है क्योंकि उनकी परीक्षा एक हफ्ते बाद है। वो सुरैया से माफ़ी मांगती है और उसे अतुल्य की नोटबुक दे देती है। उसके बाद अतुल्य को दिए बिना माँ उसपर बरसने लगती है। अतुल्य परेशान हो जाता है और अपनी माँ पर ही चिल्लाता है। ऐसा वो पहली बार करता है। उसका व्यवहार माँ को आश्चर्य में दाल देता है और वो निमित के केस में उसकी बात सुनाने का निश्चय करती है और उसने भी ऐसा पहले कभी नहीं किया।

अब आगे....

पार्ट 2 ::  "मातृत्व का थोड़ा सा अंश"

माँ का प्यार सबसे बढ़कर है 
माँ अतुल्य को इस तरह चिल्लाते देख स्तब्ध रह जाती है। वो ठीक उसके सामने खड़ा होकर रो रहा था मगर फिर भी, उसकी तरफ नहीं देख रहा था। उसकी चीख और आंसू देख कर उसे शर्मिंदगी और पछतावा होता है। उसे अंदर से बहुत पीड़ा होती है। उसने सोचना शुरू किया कि आखरी बार उसने कब अपने बेटे की बात सुनी थी मगर उसका सिर शर्म से झुक जाता है क्योंकि ऐसा आखरी बार कभी नहीं हुआ था। उसने कभी उसकी बात सुनी ही नहीं। कभी नहीं। उसने हमेशा दूसरों की बातों पर ही ध्यान  दिया था और उस पर ही विश्वास किया था।

उसे अपनी ममता नाकामयाब लगी क्योंकि उसने अपने बेटे को आजतक कभी एक सुकून भरा आलिंगन और प्रेम नहीं दिया था। उसे लगा कि ये उसकी असफलता है कि उसने अपने बेटे की बात कभी नहीं सुनी। उसने हमेशा अतुल्य को एक छोटे बच्चे की तरह समझा। उसे इस बात का ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ कि उसका बेटा शरीर से ही नहीं वरन मानसिक रूप से और किसी भी काम को करने की काबिलियत में भी बड़ा हो गया है।

वो एक बढ़िया कीबोर्ड प्लेयर, एक अच्छा पाठक और एक समझदार बच्चा बन गया है। वो अब कोई एक छोटा बच्चा नहीं रह गया है जिसे सिर्फ अपना खाना और लोरियां चाहिए। उसे अब एक बड़े इंसान की तरह प्यार, सहारा, सहानुभूति और हर एक वो आशा की ज़रुरत होगी जो कि एक बढ़ते बच्चे को ज़रुरत होती है।

'ओह! ये मैंने अपने बच्चे के साथ क्या किया? मैंने उसकी बात कभी नहीं सुनी और ये पूरी तरह से मेरी ही गलती है" माँ ने सोचा और अपने आप से उसे एक पल के लिए नफरत सी हो गयी। लेकिन एक समझदार औरत होने के नाते उसे ये भी पता था कि -- जो हो गया सो हो गया। जो हो चूका है उसे सुधारा नहीं जा सकता मगर जो आगे का समय है उसपर ध्यान दिया जा सकता है।

उसने निश्चय किया कि वो एक सबसे अच्छी माँ बन के दिखाएगी; अगर इस दुनिया के लिए ना सही तो अपने बेटे के लिए। उसने अपने आप को सम्हाला और धीरे धीरे अतुल्य की तरफ बढ़ी।

उसने उसे अपनी बाहों में भर लिया, उसके आंसू पोंछे और अपने साथ सोफे पर बैठा लिया जहाँ कुछ मिनटों पहले वो अकेले बैठी थी। उसने अतुल्य को कस के अपनी बाहों में भींच लिया जैसे कि अपने दुखते दिल को आराम पहुंचा रही हो। अतुल्य को अपनी माँ का ये व्यवहार थोडा अचंभित करने वाला लगा मगर वो खुश था। वो खुश था कि अंततः उसकी माँ उसके साथ है।

माँ ने कोमल स्वर में कहा, "मुझे माफ़ कर दो बेटा। मुझसे गलती हो गयी। मुझे सुरैया आंटी और उनकी बातों पर ज़रा भी भरोसा नहीं है। मुझे तुम पर भरोसा है और मैं तुम्हारी बात सुनना चाहती हूँ निमित के बारे में".

अतुल्य के लिए ये पल उसकी ज़िन्दगी का सबसे ज्यादा  ख़ुशी का पल था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसकी माँ सुरैया आंटी की बातों पर भरोसा ना करके उसपर भरोसा कर रही है। उसने कस के अपनी माँ को पकड़ लिया जैसे खुद को इस निर्मम दुनिया से बचाना चाह रहा हो।

"मम्मा! वो निमित अच्छा लड़का नहीं है और मेरा दोस्त भी नहीं है। जब मैं उसके घर गया तो पहले हम उसके खिलौनों के साथ खेलने लगे। बाद में उसने मुझसे पढ़ाई में मदद करने को कहा और फिर हम उसके रूम में चले गए".

माँ को घटना के इस हिस्से के बारे में सुरैया से पता चल चूका था मगर उसने चुप रहना ही बेहतर समझा। वो सुनना चाहती थी कि आखिर ऐसा हुआ क्या कि बात इतनी बिगड़ गयी; ऐसा क्या हुआ कि सुरैया ने उसके घर आकर उसके बेटे की इस तरह से बेईज्ज़ती की।

"तब वो अपना मैथ्स के सवाल करने लगा। मैंने उसकी थोड़ी बहुत मदद की मगर बाद में उसने मुझपर जोर डालना शुरू किया कि मैं उसका मैथ्स का होमवर्क पूरा करून। मुझे ठीक नहीं लगा और मैंने मना कर दिया।  में मम्मा। मुझ पर विश्वास करो। अब जबकि हमारी परीक्षा एक हफ्ते बाद है, मैंने उससे कहा कि वो अपना होमवर्क खुद करे। इससे उसे अपने विषय के बारे में समझने में मदद मिलेगी। मैंने सही किया ना मम्मा?"

उसने अपनी माँ की तरफ देखा कि वो उसपर भरोसा कर रही है या नहीं। उसकी माँ वास्तव में उसकी बात सुन रही थी और उसपर भरोसा भी कर रही थी।

"हाँ मेरे बेटे! तुमने एकदम सही किया। मुझे तुमपर बहुत गर्व है। सभी को अपना होमवर्क खुद करना चाहिए। तब क्यों तुमने उसकी मैथ्स की नोटबुक को फाड़ दिया?"

अतुल्य ख़ुशी से झूम उठा जब उसने अपनी माँ को उसपर विश्वास करते देखा। आखिकार ऐसा पहली बार हो रहा था कि उसकी माँ उसपर विश्वास कर रही थी। उसने रोना बंद कर दिया। उसका विश्वास कई गुना बढ़ गया। उसके हेर एक शब्द में सच्चाई छुपी हुई थी।

उसने धीरे से एक रहस्य से पर्दापण किया।

"नहीं मम्मा! उसने खुद अपनी नोटबुक फाड़ी थी और वो भी उसकी मैथ्स की नहीं थी अगर मैं सच बताऊँ तो। वो उसकी कोई पुराणी नोटबुक थी। जब मैंने उसका होमवर्क करने से मना कर दिया तो उसने मुझे धमकाया कि वो मुझे पीटेगा। मैं उससे डरा नहीं मम्मा। देखो मैं एक बहादुर लड़का हूँ। बल्कि मैंने कहा कि सब लोग तुम्हे डांटेंगे अगर तुमें मुझे पीटा तो। तब उसने जल्दी से अपनी मैथ्स की नोटबुक अपने स्कूल बैग में राखी और जल्दी से अपनी कोई पुरानी नोटबुक ले आया। उसने उसे फाड़ा, उसके टुकड़े ज़मीन पर फैला दिए और जोर जोर से रोने लगा। मुझे समझ नहीं आया कि वो क्या कर रहा था। तब मुझे थोडा डर लगा मम्मा। तब सुरैया आंटी आई और निमित ने उन्हें बताया कि मैंने उसकी नोटबुक फाड़ दी है। उन्होंने बिना चेक किये मुझ पर चिल्लाना शुरू कर दिया। तब उन्होंने मुझपर दबाव डालना शुरू किया कि मैं अपनी गलती मान लूं मगर मैं वो गलती कैसे मान सकता हूँ जो मैंने किया ही नहीं मम्मा? तब वो तुम्हारे पास आई और सब झूठ कहा".

माँ ये सब सुनकर बेहद अचंभित हुई। निमित एक बेहद चालाक लड़का था मगर फिर भी वो एक बच्चा था। बच्चे अक्सर ऐसी बातें कर बैठते हैं जो उन्हें नहीं करनी चाहिए मगर सुरैया? वो तो एक बड़ी और समझदार इंसान है। उसे अतुल्य की बात सुननी चाहिए थी और तब कोई एक्शन लेना चाहिए था। गुस्से में आकर उसके बेटे की ऐसी बेईज्ज़ती करने का उसे कोई अधिकार नहीं था। वो वैसे भी एक संकुचित दिमाग की महिला थी और उसके असभ्य व्यवहार ने एक बार फिर इसे साबित कर दिया था।

माँ ने उससे इसी समय बात करने का फैसला किया।

"तुमने बिलकुल सही किया अतुल। तुम्स सच में एक बहादुर बच्चे हो। अपनी बात पर अड़े रहने के लिए मैं बहुत खुश हूँ। निमित को ऐसा नहीं करना चाहिए था। अब हम सुरैया आंटी के घर जायेंगे और उन्हें सच बताने की कोशिश करेंगे। ठीक है?" माँ सुरैया के बारे में सोच रही थी वो उसे किसी भी हालत में ओने बेटे के सामने नहीं कह सकती थी। ऐसा करने से उसपर बुरा असर पड़ता।

"हाँ मम्मा। हम जायेंगे मगर मुझे डर है कि वो फिर से मुझे बुरा भला कहेंगी" उसने चिंतित होकर कहा।

माँ ने उसके डर को कम करने की कोशिश करते हुए कहा, "तुम्हे मेरे आस पास कभी भी कोई भी बुरा नहीं कहेगा अतुल। तुम मेरे एक बहादुर और एक बहुत अच्छे बेटे हो। कोई भी तुम्हारी बुराई नहीं करेगा मगर ये ज़रूरी है कि हम इस घटना पर बातचीत करें। चलो चलें" वो सुरैया जैसी अव्यावहारिक एयर ज़हर उगलने वाली महिला से आमने सामने बात करने को खड़े हो गए।

माँ थोड़ी चिंतित थी मगर यही वो समय था जब वो अतुल्य को दिखा सकती थी कि वो उसके लिए कितना मायने रखता है। अपने पहले के लापरवाही की वजह से वो ऐसा मौका नहीं खोना चाहती थी। उसने सच को बताने का निश्चय किया चाहे जो कुछ भी हो जाए

उसने अतुल्य का हाथ पकड़ा और दरवाज़े की घंटी बजा दी। कुछ समय बाद निमित के दरवाज़ा खोला। पहले पहल तो वो अतुल्य को उसकी माँ के साथ देख कर सकपका गया (क्योंकि वोही इस पूरी घटना का ज़िम्मेदार था) मगर जिस तरह से उसकी माँ सुरैया ने थोड़ी देर पहले हल्ला किया था उसकी वजह से उसके चेहरे पर दुष्ट भरी मुस्कराहट आ गयी।

हेल्लो निमित बेटा! तुम्हारी माँ कहाँ है?" माँ ने मीठी आवाज़ में पूछा। उसे पता था कि निमित की तरफ ज़हर उगलने से उसके और सुरैया में कोई अंतर नहीं रह जायेगा।

निमित अंदर गया और अपनी माँ को बुलाया। सुरैया इतनी बेईज्ज़ती होने के बाद माँ बेटे को अपने दरवाज़े पर पाकर थोड़ी हैरत कें पद गयी मगर उसने ज्यादा कुछ नहीं कहा।

"क्या चाहिए तुम्हे?" उसने तल्खी से पूछा।

माँ ने अतुल्य का पसीने से भरा हाथ जोर से पकड़ लिया ताकि उसे और डर ना लगे और सही बात को कोमल शब्दों में कहा।

"सुरैया! मुझे ऐसा विश्वास है की निमित ने तुम्हे गलत बताया है। उसने खुद अपनी नोटबुक फाड़ी है".

निमित का चेहरा ये सुनकर सफ़ेद पड़ गया। उसे पता था कि अतुल्य की माँ उसपर कभी भरोसा नहीं करेंगी और ठीक इसी वजह से उसने उसके साथ ये छल किया था। मगर उन्हें ना सिर्फ सच कहते हुए बल्कि अतुल्य पर भरोसा करते देख वो डर गया। उसे समझ आ गया कि देर सवेर सच सामने आ ही जायेगा।

"क्या बकवास कर रही हो? निमित कभी भी ऐसा नहीं कर सकता। ये तुम्हारा बदतमीज़ बेटा है जिसने..." और वो अपनी बात [पूरी ना कर सकी। माँ ने उसे अपने शांत और मजबूत आवाज़ से बीच में ही रोक दिया।

"बहुत हो गया सुरैया। मेरे बेटे के बारे में अब मैं एक भी बुरा शब्द नहीं बर्दाश्त करूंगी। वो एक बहुत ही अच्चा और समझदार बच्चा है और मुझे उसपर पूरा वुश्वास है। उसने मुझे बताया कि निमित चाहता था कि अतुल्य उसका पूरा होमवर्क करे और जब उसने ऐसा करने से मना कर दिया तब उसने अपनी नोटबुक खुद ही फाड़ दी".

अब सुरैया की बारी थी झटका खाने की। उसे विश्वास नहीं हुआ।

"तुम झूठ बोल रही हो। तुम मेरी पड़ोसन हो। इसका  ये नहीं कि तुम कुछ भी कह दोगी".

"ठीक कहा। यही बात तुम पर भी लागो होती है सुरैया" माँ ने अपने गुस्से को बहुत प्रयास के साथ नियंत्रित कर रखा था। उसके बात चीत करने के तरीके से उसके बेटे पर हेर तरह से असर पड़ेगा। वो उसके सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहती थी कि ज़िन्दगी में आई किसी भी मुसीबत से कैसे डील करते हैं और किस तरह से बिना डरे अपनी बात पर टिके रहते हैं।

ये सब बकझक बहुत था आस पास के पड़ोसियों का इकट्ठा करने के लिए। सभी लोग जानना चाहते थे कि क्या हुआ। एक को बेहद ख़ुशी थी कि उसे एक चटपटी गपशप के लिए मसाला मिल गया था तो दूसरी अपने होठ चबा रही थी ये देख कर कि उसे आमतौर पर सास बहु जैसे रोजाना के धारावाहिक से ज्यादा आनंद मिल रहा था। सभी लोग घटना के हेर एक हिस्से को पूरी शिद्दत के साथ मज़े लेकर देख रहे थे।

"क्या फ़ालतू की बात है! तुम पागल हो आगयी हो। हाहाहाहा। देखो तो सुमन! ये कैसी पागल जैसी बातें कर रही है। निमित भला अपनी नोटबुक क्यों फाडेगा और वो भी परीक्षा के ठीक एक हफ्ते पहले?"

सुरैया ने एक विभत्स हंसी के साथ कहा। जो लोग अंदर से असुरक्षा की भावना से भरे होते हैं वो या तो शांत रहते हैं या दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं। सुरैया बाद वाले की उदाहरण थी।

"हाँ। वो ऐसा क्यों करेगा? वो नहीं करेगा। उसकी मैथ्स की नोटबुक उसके स्कूल बैग में बिलकुल सुरक्षित है और उसने अपनी दूसरी नोटबुक फाड़ कर हम सबको बेवक़ूफ़ बनाया है। जहाँ तक मेरा अनुमान है तुमने ज़मीन पर बिखरे कागजों को चेक करने की भी ज़रुरत नहीं समझी होगी? सही कहा न मैंने?" माँ ने बाकी पड़ोसियों की उपस्थिति से अप्रभावित होते हुए घर के अंदर घुस गयी। वो सीधे निमित के रूम की तरफ बढ़ी।

निमित की आंखें डर से भर गयी। वो पसीने से नहा उठा। अब उसका झूठ सबके सामने आ जायेगा और उसकी माँ उसे सबके सामने दान्तेगी। उसके दिमाग ने इस मुश्किल परिस्थिती से निकलने के लिए काम करना बंद कर दिया।

सुरैया उन दोनों को नहीं चाहती थी कि वो निमित के कमरे में जाएँ मगर अपने आप को सही साबित करने के लिए वो ऐसा ना कर सकी। उसने बेमन से उन्हें अंदर आने दिया और साथ ही साथ अपने बेटे का गुणगान भी करती रही। दुसरे पडोसी भी पीछे पीछे निमित के रूम तक आ गए।

"निमित ऐसा कभी नहीं कर सकता। आइये मैं आप सबको दिखाती हूँ कि अतुल्य झूठा है। देखिये अभी भी सारे फटे हुए कागज़ ज़मीन पर बिखरे पड़े हैं" उसने कहा और उनमे से कुछ हाथ में उठा लिया चेक करने के लिए। माँ को पेपर्स देखने की परवाह ना थी। उसे निमित का स्कूल बैग चाहिए था जहाँ उसकी मैथ्स की नोटबुक थी। यही एक रास्ता था अतुल्य को सही साबित करने का।

निमित भयभीत हो गया उर उसने अपना स्कूल बैग कस के पकड़ लिया। माँ ने उसे कुछ देर कड़ी निगाह से देखा और बैग अपने आप निमित के हाथो से छूट गया। वो जान चूका था कि अब उसका भेद खुलने वाला है।

माँ ने स्कूल बैग में ढूँढा और उसकी मैथ्स की नोटबुक निकाल ली, जो की बिलकुल सही सलामत थी। किसी भी फटने या काटने का कोई निशाँ नहीं था उस पर। वो नोटबुक बिलकुल ठीक स्थिति में थी।

सभी का, यहाँ तक कि सुरैया का भी मुंह खुला का खुला रह गया ये देख कर। मैथ्स की वो नोटबुक जिसे फाड़ने के लिए निमित ने कुछ घंटों पहले अतुल्य के उपर इलज़ाम लगाया था वो एकदम सही सलामत थी। उसके उपर किसी भी तरह के खंरोच का कोई निशाँ नहीं था।

सभी लोग फुसफुसाने लगे। वो निमित और उसकी माँ के व्यवहार को धिक्कारने लगे। सच जान कर सुरैया के मुंह से एक भी बोल नहीं फूटा। अपने शर्म और असफलता को कम करने के लिए उसने निमित को पीटना शुरू किया।

तेज़ी से माँ ने उसके हाथ को पकड़ लिया। उसने उससे कोमल शब्दों में याचना की।

"अगर तुम उसे पीटोगी सुरैया तो विश्वास करो, वो कभी भी एक अच्छा इंसान नहीं बन पायेगा। वो एक बच्चा है और उसने जो किया वो कोई बड़ी बात नहीं है। बच्चे झूठ बोलते हैं। ये उनकी नैसर्गिक आदत है। ये हमारा कर्त्तव्य है कि उन्हें सही गलत में फर्क समझाएं और सही बात को सही तरीके से रखें। मैं तुमसे निवेदन करती हूँ कि निमित को अब और न पीटो। आखिरकार वो भी एक अच्छा बच्चा है। एक गलती उसे अच्छे से बुरा नहीं बना देगी" और तब वो निमित की तरफ मुड़ी।

"निमित! तुम एक अच्छे लड़के हो मेरे बेटे अतुल की तरह। तुमने झूठ कहा ये निश्चयतःएक बुरी बात है। किसी को ऐसा नहीं करना चाहिए मगर एक अच्छा इंसान वो होता है जो अपनी गलतियों से सबक ले और अगली बार अच्छे काम करके दिखाए। मैं तुमसे नफरत नहीं करती। मैं अभी भी तुमसे प्यार करती हूँ और चाहती हूँ कि तुम एक अच्छे बच्चे बनो। वादा करो कि अब से तुम झूठ नहीं कहोगे" उसके मृदु सहानुभूति भरे शब्दों ने निमित के उपर जादू का सा असर किया। उसकी आँखों से आंसू निकल पड़े।

"मुझे माफ़ कर दीजिये आंटी। ये सब मेरी गलती है। अतुल्य ने जो कहा वो सब सच है। मैं उसे सजा देना चाहता था क्योंकि वो मेरा होमवर्क नहीं कर रहा था। मुझे इस बात का बहुत दुःख है। मैं अब से कभी झूठ नहीं कहूँगा। यहाँ तक कि अब मैं एक अच्छा बच्चा बनूँगा और ज़िन्दगी में कभी कोई बुरा काम नहीं करूंगा . प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिये" माँ ने निमित को भी अपनी बाहों में भर लिया। उसे उसके शब्दों पर पूरा भरोसा था। माँ समझ गयी कि अब उसका काम पूरा हो गया।

वहीँ अतुल्य विस्मय से ये सब कुछ देख रहा था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि सिर्फ उसकी बातों पैर ही विश्वास करके उसकी माँ ने उसका साथ दिया। उसे समझ आ गया था कि जो ये कहते हैं कि माँ सबसे अच्छी दोस्त होती है, वो झूठ नहीं कहते।

ये सब देखने के बाद उसे समझ आ गया था कि स्थिति को कैसे सामान्य करते हैं और लोगों में बढ़ते गुस्से को भी। उसे समझ आया कि गुस्साने या परेशान होने से समस्या हल नहीं होती। बल्कि, शांत और स्थिरता से समस्या का समाधान ढूँढने से सब कुछ ठीक हो जाता है। उसे भी अपनी माँ पर बेहद गर्व हुआ।

माँ के एक सही व्यवहार ने कितनी सारी बातों को ठीक कर दिया ::


  • निमित को अपनी गलती का एहसास हुआ। ये उसे एक अच्छे बच्चे की तरह बनने में सहायता करेगा।
  • सुरैया, अब से, कभी भी किसी के उपर नहीं चिल्ला पायेगी जैसा उसने उन दोनों के साथ किया। किसी की बेईज्ज़ती करने से पहले वो हज़ार बार सोचेगी।
  • पडोसी जो कि मनोरंजन की तलाश में आये थे वो भी इंसानियत के नाते सोच में पद गए। उन्होंने माँ के सच उजागर करने की साहस को बहादुरी भरा कदम माना। उन्होंने उसकी जी भर के प्रशंसा की जब उसने निमित की माँ को उसे पीटने से रोका। ये एक समझदारी वाला काम था, ऐसा उन्हें लगा।
  • और सबसे ख़ास बात, माँ अपने बेटे का विश्वास अर्जित करने में सफल हो गयी थी और ये उसके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात थी।

जब अतुल्य अपनी माँ के साथ घर वापस आया तो उसने उसे अपने आलिंगन में बाँध लिया।

"आई लव यू मम्मा। आई लव यू सो मच। आपने मुझ पर विश्वास किया इस बात की मुझे बेहद ख़ुशी है".

"आई लव यू टू अतुल। मुझे तुम पर एक अच्छा और बहादुर बेटे होने की वजह से बेहद गर्व है। मैं तुम पैर हमेशा विश्वास करूंगी अतुल। इस बात को हमेशा ध्यान में रखना".

माँ का हृदय गर्व और आँखें प्रेम से भर गयीं। उसने अपनी ज़िन्दगी में ऐसी अपार ख़ुशी का अनुभव कभी नहीं हुआ था। उसे नहीं पता था कि थोड़ी सी समझदारी एक बच्चे के लिए कितनी बड़ी बात हो सकती है।

उसे नहीं पता था कि ममता का थोड़ा सा अंश उसे इतनी ख़ुशी, उल्लास और प्यार से सरोबार कर देगा।

माँ को पता था कि सुखद मातृत्व की तरफ उसने अपना पहला कदम उठा लिया था। उसे सिर्फ इतना ही करना था कि, उसे अपने बेटे की बातों को सुनना था और उस पर दुनिया में सबसे ज्यादा भरोसा करना था।

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और यहीं ये कहानी ख़तम होती है। मोटे तौर पर कोई भी कहानी कभी ख़तम नहीं होती। ये एक विराम लेती है मगर हम लेखक उस विराम को एक उपयुक्त अंत में बदलने को तवज्जो देते हैं।

Parenthood हमेशा थोडा सा देने का नाम होता है। ये आपके उपर निर्भर करता है कि आप इस थोड़े से को कितना बड़ा या छोटा बनाते हैं।

उम्मीद है कि मेरे पाठकगण को कहानी का ये हिस्सा भी पढ़ने में आनद आया होगा।

अपने अगले पोस्ट में मिलते हैं।

शुभ रात्रि और मीठी नींद के साथ अलविदा।

इसी पोस्ट को ENGLISH में यहाँ पढ़ें :: "Can you please borrow my eyes?" Part 2 :: "A little piece of parenting"




















































































































































































































































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