22 March 2017

आसमां से ग़र चाँद मांग लूँ
तो जन्नत में रौशनी कैसे होगी ?

सुबह से ग़र सूरज मांग लूँ
तो रात के सीने में शाम कैसे होगी ?

अनसुनी अनकही बातों का भी
काश कोई ग़वाह होता,
ह्रदय ही ग़र जो खोल कर रख दिया
तो ख़ामोशी की तलब कैसे होगी ?

यूँ तो वक़्त के झरोखे में बिखरे हैं कई मोती
कुछ मेरे तो कुछ तोहफे स्नेह के,
उन मोतियों को ही ग़र ना सहेज लूँ
तो यादों में पहल कैसे होगी ?

कहते हैं 'मनुष्य तूफ़ां है तो भावनाएं साहिल हैं'
लहरों में जो ना बहे तो किनारों पर हलचल कैसे होगी ?

मुस्कुराने के तो बहुत से बहाने हैं
कुछ साक्ष तो कुछ अनभिज्ञ,
होंठ ही ग़र जो स्वावलंबी हो गए
तो आँखों में चमक कैसे होगी ?

चुप सी चलती बेहोश सी ये ज़िन्दगी
हर एक आंधी को बाहों में समेटे,
तिनके ही ग़र जो ना सिमट पाएं
तो कहीं और बहार कैसे होगी ?

अनुलेख  अपनी इस कविता का कोई शीर्षक नहीं मिल पाया मुझे लेकिन जिस दिन मिल जायेगा, उस दिन यहाँ पर होगा। 


1 comment:

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