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Showing posts from January, 2018

ये सिर्फ एक लड़की का नहीं, दोनों का साझा काम है।

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पिछले हफ्ते मैं अपनी सहेली से फ़ोन पर बात करने में मशग़ूल थी। मुझे याद नहीं कब हम दोनों की बातों का सिलसिला इस तरफ घूम गया मगर इतना ज़रूर याद है कि हम काम बांटने के बारे में बात कर रहे थे।  इससे पहले मैं आगे कुछ कहूँ, मेरा निवेदन है कि आप पहले ये वीडियो देखें : 


यह वीडियो बहुत सशक्त और प्रभावी वीडिओज़ में से एक है। 
तो वापस आते हैं उस फ़ोन कॉल पर। मेरी सहेली ने अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से एक चुना हुआ पल मुझे बताया।
"हम रात का खाना (डिनर) कर चुके थे। मैं बचे हुए खाने के बर्तन रसोई में हटा  रही थी। वापस आकर जब मैं जूठी प्लेट्स को रसोई में धोने के लिए ले जाने लगी तो मेरे पति आ गए और मुझसे वो प्लेट्स लेने लगे। अमेरिका में घर के काम करने के लिए कोई नहीं मिलता। सब हमें खुद ही करना होता है। जब मेरे पति प्लेट्स लेने लगे तो मैंने मना करते हुए कहा कि कोई बात नहीं। मैं कर लूंगी। जिसके जवाब में उन्होंने ये कहा :

चलिए बात करते हैं मेरी आलोचना के विषय में

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जब लोग आपके द्वारा किये गए किसी काम की आलोचना करते हैं तो उसे सुनना आसान नहीं होता।  सबका अपना तरीका होता है आलोचना से जूझने का। मगर किसी भी आलोचना से निपटने का एक बहुत अच्छा रास्ता है : मुस्कुराते रहिये और जो भी सकारात्मक बात मिल सके, अपना लीजिये। 
लेखिका होने पर मुझे कई बार आलोचना का सामना करना पड़ता है। जब मेरी नयी किताब/नावेल - द शैडो ऑफ़ डार्कनेस - आयी तो स्वभावतः मुझे बेहद ख़ुशी हुई। जब भी अपनी किताबों को घर में देखती हूँ तो बहुत प्रसन्नता  है। 
कुछ समीक्षकों ने मेरी नयी बुक की समीक्षा की है। जहाँ उनमें से कुछ ने अपनी उदारता दिखाई  और किताब के मज़बूत पक्षों पर ज़्यादा ध्यान दिया, वहीँ कुछ ने नकारात्मक पक्ष पर चश्मा साध लिया। चिंता ना कीजिये ! मैं दोनों तरह की आलोचनाओं  का सम्मान करती हूँ। 

और कुछ ने तो अपनी समीक्षा में ऐसी बातें लिखी जो सच ही नहीं हैं। अच्छी और बुरी समीक्षा का स्वागत मैं करती हूँ मगर गलत आलोचना मुझे ज़रा पसंद नहीं आती। क्योंकि वो गलत नजरिया सिर्फ मैं ही नहीं वरन कई लोग पढ़ रहे हैं।  जिसकी वजह से मेरी इतनी मेहनत से लिखी गयी किताब पर गलत असर पड़ेगा। 
तो आज मैं हिम्मत की …

पेरेंट्स की शादी की वर्षगांठ पर छोटी सी कविता

कर्तव्यों की सीढ़ी चढ़ते - चढ़ते
जाने कहाँ छोड़ आये हम खुशियों की ज़मीन
मुस्कुराये हुए तो जाने एक ज़माना हो गया
और लोग कहते हैं वजह भी हैं हम हीं !

रिश्तों के भंवर में घूमते घूमते
सीधी सी ज़िन्दगी भी उलझ गयी
चले थे ज़िम्मेदारियों की बागडोर सम्हालने
पर अपने ही थोड़े बदल गए;

अब नहीं होता,  बस बहुत हो गया !
सहन नहीं होता, बहुत हो गया !
एक पल को ही सही पर कहीं छुप जाते
माँ -बाप के साये में एक बार बच्चे फिर बन जाते !
वही कोमल बूढ़ी उँगलियों को पकडे
बचपन की गलियों में दौड़ आते
थोड़ा सा गिरते, थोड़ा सम्हल आते;

लौटा नहीं सकते समय के चक्र को
तो आगे ही देखना है, मेरे साथी!
सैंतीस साल बीत गए तुम्हारे संग
तुम ही हो मेरी जीवनसाथी ;

ग़म न करो , मेरे हमसफ़र !
रिश्तों के इस भंवर में
ज़िम्मेदारियों के इस समंदर में
मैं हूँ आपका हाथ पकडे
खड़ी आपके पीछे हिम्मत बन के !

साथ जो ग़र है एक दुसरे का
मुश्किल से मुश्किल दौर भी गुज़र जाएगा;
चलो आज एक बार फिर जी लें
थोड़ा हंस लें, थोड़ा मुस्कुरा लें
कल से फिर वही ज़िन्दगी में चलना है
साथ जो हम हैं तो फिर क्या डरना है !

P.S. यह कविता मैंने अपने माँ - पापा की शादी की वर्षगांठ पर बनायी है। उन्हें बहुत पसंद आया ! कुछ ऐ…

क्या प्यार ही सब कुछ है ?

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रिश्ता चाहे कोई भी हो , प्रेम, स्नेह, और सान्निद्ध्य का उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। हमारे प्रियजन का प्यार और आशीर्वाद ही वो कड़ी है जो हमें सदैव आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। कुछ समय पहले पढ़ी गयी कुछ खूबसूरत पंक्तियाँ याद आ गयीं।  
हमने पूछा 'उम्र' और 'ज़िंदग़ी में फरक क्या है ? बहुत सुन्दर जवाब मिला- जो अपनों के बिना बीती वो 'उम्र' और जो अपनों के साथ बीती वो 'ज़िंदग़ी'। 

मगर क्या प्यार ही सब कुछ होता है रिश्तों में ? क्या प्यार ही वो मापदंड है जिसकी अधिकाधिक इकाई रिश्तों की मधुरता का द्योतक है ? यूँ तो सोचने में लगता है कि, हाँ ! प्यार ही तो सब कुछ है। प्रेम और स्नेह ही तो वो भावनाएं हैं जो इंसान को पूरा करती हैं ; जो उन्हें पास लाती हैं ; जिनसे जीवन में हर कठिनाई से जूझने का सम्बल मिलता है। अगर प्रेम नहीं तो कुछ भी नहीं ! ऐसा ही कुछ लगता है ना ? तो चलिए ! आपको सोच के सागर में थोड़ी और गहराई तक ले जाते हैं।  ऐसी गहराई जहाँ सिर्फ सोच के चमकते मोती ही नहीं वरन जीवन के कुछ छोटे - बड़े अनुभवों का भी एक छोटा सा इंद्रधनुष है।