22 January 2018

क्या प्यार ही सब कुछ है ?

रिश्ता चाहे कोई भी हो , प्रेम, स्नेह, और सान्निद्ध्य का उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। हमारे प्रियजन का प्यार और आशीर्वाद ही वो कड़ी है जो हमें सदैव आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। कुछ समय पहले पढ़ी गयी कुछ खूबसूरत पंक्तियाँ याद आ गयीं।  

हमने पूछा 'उम्र' और 'ज़िंदग़ी में फरक क्या है ? बहुत सुन्दर जवाब मिला- जो अपनों के बिना बीती वो 'उम्र' और जो अपनों के साथ बीती वो 'ज़िंदग़ी'। 


मगर क्या प्यार ही सब कुछ होता है रिश्तों में ? क्या प्यार ही वो मापदंड है जिसकी अधिकाधिक इकाई रिश्तों की मधुरता का द्योतक है ? यूँ तो सोचने में लगता है कि, हाँ ! प्यार ही तो सब कुछ है। प्रेम और स्नेह ही तो वो भावनाएं हैं जो इंसान को पूरा करती हैं ; जो उन्हें पास लाती हैं ; जिनसे जीवन में हर कठिनाई से जूझने का सम्बल मिलता है। अगर प्रेम नहीं तो कुछ भी नहीं ! ऐसा ही कुछ लगता है ना ? तो चलिए ! आपको सोच के सागर में थोड़ी और गहराई तक ले जाते हैं।  ऐसी गहराई जहाँ सिर्फ सोच के चमकते मोती ही नहीं वरन जीवन के कुछ छोटे - बड़े अनुभवों का भी एक छोटा सा इंद्रधनुष है। 

ट्विटर (Twitter) पर मेरे द्वारा किये गए एक अन्वेषण (poll) में एक बहुत रोचक बात सामने आयी।  उसमे मैंने ये पूछा था कि आप अपनी परेशानियों को किससे सबसे ज़्यादा शेयर करने में सहज महसूस करते हैं - १. पेरेंट्स , २. सबसे अच्छा दोस्त, ३. डायरी या, ४. एक अजनबी। मैंने एक अजनबी का विकल्प इसलिए रखा क्योंकि कभी - कभी परेशानियों को किसी ऐसे इंसान के साथ शेयर करना बहुत आसान हो जाता है जो हमें न जानता हो और ना ही उसकी कोई राय हमारे बारे में पहले से है। ऐसी परिस्थिति में वो इंसान हमें किसी भी गलत तरीके से आंक नहीं पायेगा और हमें अपनी बात कहने में संकोच भी नहीं होगा। इसका उल्टा अक्सर रिश्तों में होता है। जानने वाले बहुत तेज़ी से हमारे द्वारा कहे गए शब्दों की कसौटी पर हमें परखते हैं और जाने अनजाने हमारे बारे में गलत राय भी बना लेते हैं. अंग्रेजी में इसे Judgmental होना कहते हैं। एक उदाहरण मैं दूँ अगर आपको तो वो मूवी इंग्लिश विंग्लिश से होगा। इसमें एक साधारण सी भारतीय हाउसवाइफ , शशि (श्रीदेवी), एक फ्रेंच महोदय के सामने अनजाने में अपनी सारी परेशानियां खोल कर रख देती है। कुछ परिस्थिति ही ऐसी बन जाती है। अब मज़े की बात यह कि ना तो शशि को फ्रेंच आती है और ना ही उन महोदय को हिंदी मगर भाषा यहाँ आत्म अभिव्यक्ति को विराम नहीं दे पाती।  तो ये होता है किसी अजनबी से बातें शेयर करने का फायदा। उसने आपकी बातों को समझा भी नहीं और आपका मन भी हल्का हो गया। अब आप राह चलते किसी को भी पकड़ कर अपनी कहानी ना सुनाएं।  ऐसा मेरा मतलब नहीं है। 

तो फ़िलहाल उस अन्वेषण पर आते हैं। ज़्यादातर लोगों ने कहा कि वो अपने सबसे अच्छे दोस्त से अपनी परेशानियां को साझा करने यानी शेयर में सहज महसूस करते हैं।  

मगर क्यों? प्यार तो हमें हमारे माँ - बाप सबसे ज़्यादा करते हैं। फिरदोस्त ही क्यों आगे आया ?

क्योंकि दोस्त हमें समझते हैं ; वो हमें हमारे व्यक्तित्व के उस स्तर तक जाकर समझते हैं जहाँ तक माँ - बाप या किसी और का पहुँचना मुश्किल होता है। जहाँ हमारे बारे में हमारे परिवार और परिजनों की एक मिलीजुली राय पहले से बन चुकी होती है उसके विपरीत, दोस्ती एक ऐसा रिश्ता होता है जो आपको किसी स्केल से नहीं नापता। दोस्त आपको या आपकी गतिविधियों की अन्यथा जांच-परख नहीं करते या आपके बारे में अनुमान नहीं लगाते। आपकी  गलतियों से जहाँ रिश्तेदारों ने पूरा घर सर पर उठा लिया वहीँ दोस्त आपकी डगमगाती दुनिया को सहारा देते हैं। पड़ोस में की गयी हाथापाई में जहाँ माँ - बाप ने आपको बिना कुछ कहने सुनने का मौका दिए दोषी क़रार दे दिया वहीँ दोस्त आपके साथ खड़े होकर आपकी रक्षा करते हैं।  वो आपको जज नहीं करते।  वो आपको प्यार ही नहीं बल्कि समझते भी हैं और आपके साथ रिश्ते को इज़्ज़त भी देते हैं। 

समझ, इज़्ज़त, ईमानदारी जैसे कुछ और भी पहलु हैं जिनपर रिश्तों का भार टिका होता है।  महज़ प्यार दे देने से ही आप और आपका रिश्ता सर्वोपरि नहीं हो जाता।  जब तक आप  दूसरों को समझेंगे नहीं, उनकी इज़्ज़त नहीं करेंगे और उनके एकांत रहने की इच्छा को तरजीह नहीं देंगे तब तक सिर्फ प्यार ही रिश्तों की गाडी आगे नहीं ले जा सकता। सिर्फ प्यार पर चलने वाले रिश्ते चल तो जाते हैं मगर जल्द ही उनके रास्तों पर कठिनाइयां आने लगती हैं। मगर समझ, इज़्ज़त और सत्यनिष्ठा पर आश्रित रिश्ते लचीले बनते हैं - किसी भी समय के अनुकूल ढल जाते हैं मगर टूटते नहीं। 

तो प्यार, समझ, इज़्ज़त और सत्यनिष्ठा से निभाए गए रिश्ते हमें ज़िन्दगी जीने का मौका देते हैं ना कि सिर्फ चलते रहने का। 

आपकी क्या राय है ? क्या आप सहमत हैं  मुझसे या कुछ और भी कहना शेष रह गया ? 


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