28 January 2018

पेरेंट्स की शादी की वर्षगांठ पर छोटी सी कविता

कर्तव्यों की सीढ़ी चढ़ते - चढ़ते
जाने कहाँ छोड़ आये हम खुशियों की ज़मीन
मुस्कुराये हुए तो जाने एक ज़माना हो गया
और लोग कहते हैं वजह भी हैं हम हीं !

रिश्तों के भंवर में घूमते घूमते
सीधी सी ज़िन्दगी भी उलझ गयी
चले थे ज़िम्मेदारियों की बागडोर सम्हालने
पर अपने ही थोड़े बदल गए;

अब नहीं होता,  बस बहुत हो गया !
सहन नहीं होता, बहुत हो गया !
एक पल को ही सही पर कहीं छुप जाते
माँ -बाप के साये में एक बार बच्चे फिर बन जाते !
वही कोमल बूढ़ी उँगलियों को पकडे
बचपन की गलियों में दौड़ आते
थोड़ा सा गिरते, थोड़ा सम्हल आते;

लौटा नहीं सकते समय के चक्र को
तो आगे ही देखना है, मेरे साथी!
सैंतीस साल बीत गए तुम्हारे संग
तुम ही हो मेरी जीवनसाथी ;

ग़म न करो , मेरे हमसफ़र !
रिश्तों के इस भंवर में
ज़िम्मेदारियों के इस समंदर में
मैं हूँ आपका हाथ पकडे
खड़ी आपके पीछे हिम्मत बन के !

साथ जो ग़र है एक दुसरे का
मुश्किल से मुश्किल दौर भी गुज़र जाएगा;
चलो आज एक बार फिर जी लें
थोड़ा हंस लें, थोड़ा मुस्कुरा लें
कल से फिर वही ज़िन्दगी में चलना है
साथ जो हम हैं तो फिर क्या डरना है !

P.S. यह कविता मैंने अपने माँ - पापा की शादी की वर्षगांठ पर बनायी है। उन्हें बहुत पसंद आया ! कुछ ऐसा लगता है कि माँ - बाप को आप पर गर्व हो, इससे अच्छी कोई और बात हो सकती है क्या ? मुझे बस ख़ुशी है कि उन्हें पसंद आया। 



1 comment:

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